कोरबा पश्चिम ताप संयंत्र में फूटा ठेका श्रमिकों का गुस्सा, प्रबंधन-ठेकेदार गठजोड़ पर उठे सवाल

कोरबा छत्तीसगढ़

कोरबा। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी लिमिटेड के 210 मेगावाट ताप विद्युत संयंत्र, कोरबा पश्चिम में ठेका श्रमिकों का आक्रोश खुलकर सामने आ गया। वेतन भुगतान में देरी, कम भुगतान, ईपीएफ और ईएसआईसी संबंधी शिकायतों के साथ-साथ कार्यस्थल परिवर्तन को लेकर नाराज श्रमिकों ने प्रशासनिक भवन के सामने प्रदर्शन किया और बाद में मुख्य गेट पर बैठकर विरोध जताया।

श्रमिकों का आरोप है कि ठेकेदार समय पर भुगतान नहीं करता और मांग उठाने पर दबाव बनाया जाता है। उनका कहना है कि जब उन्होंने अपनी समस्याएं अधिकारियों के सामने रखीं तो समाधान के बजाय अधिकारियों का रवैया ठेकेदार के पक्ष में दिखाई दिया। इसी दौरान अधिकारियों और श्रमिकों के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई।

वर्षों से संयंत्र में कार्यरत मजदूरों ने कहा कि उनके अनुभव और मेहनत से उत्पादन व्यवस्था संचालित होती है, लेकिन जब अपने अधिकारों की बात आती है तो उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। श्रमिकों ने सवाल उठाया कि यदि ठेका व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुरूप है तो वेतन, ईपीएफ, ईएसआईसी और कार्यस्थल को लेकर लगातार शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं।

बताया गया कि प्रशासनिक भवन के समीप शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे श्रमिकों को सुरक्षाकर्मियों द्वारा हटाने का प्रयास किया गया, जिसके बाद आक्रोशित मजदूर मुख्य गेट पर धरने पर बैठ गए। कड़ी धूप में घंटों तक चले इस विरोध के दौरान अधिकारी और महिला अधिकारी भी बाहर खड़े रहे। अधिकारियों के अंदर जाने में बाधा उत्पन्न होने के बाद प्रबंधन ने ठेकेदार को मौके पर बुलाया।

बातचीत के दौरान श्रमिकों ने स्पष्ट मांग रखी कि उन्हें उनके अनुभव वाले कार्य से न हटाया जाए और समय पर भुगतान सुनिश्चित किया जाए। मजदूरों का कहना था कि अनजान कार्यस्थल पर भेजे जाने से दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ सकती है। वहीं ठेकेदार पक्ष ने किसी भी श्रमिक को हटाने के आरोप से इनकार करते हुए कहा कि आवश्यकता के अनुसार कार्यस्थल में बदलाव किया जाता है।

पूरे घटनाक्रम के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि प्रबंधन श्रमिक हितों को लेकर गंभीर है तो शिकायतों का समाधान पहले क्यों नहीं किया गया? क्या ठेका व्यवस्था की निगरानी केवल कागजों तक सीमित है? क्या श्रमिकों की मेहनत का उचित मूल्य उन्हें मिल पा रहा है? और क्या प्रबंधन तथा ठेकेदार के बीच ऐसी कार्यप्रणाली विकसित हो गई है, जिसमें मजदूरों की आवाज कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है?

हालांकि लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, लेकिन जिस तरह श्रमिकों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा और अधिकारियों के सामने बहस की स्थिति बनी, उसने संयंत्र की ठेका व्यवस्था और श्रमिक प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बाद में पुलिस प्रशासन के हस्तक्षेप से स्थिति शांत हुई और अधिकारियों को अंदर भेजा गया। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि श्रमिकों की शिकायतों पर केवल आश्वासन दिया जाएगा या ठोस कार्रवाई भी होगी।

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