बदलता हुआ गांव यह कहानी है हर गांव कि

: बदलता हुआ गांव

गणेश राम सूर्यवंशी

आज से लगभग चालीस , पचास साल पहले का समय था। गर्मियों की एक सुनहरी शाम, गांव के पीपल के पेड़ के नीचे चौपाल सजी रहती थी। मिट्टी की सोंधी खुशबू, दूर कहीं बैलों की घंटियों की आवाज और पास में खेलते बच्चों की खिलखिलाहट—पूरा माहौल जीवंत और अपनापन भरा लगता था।

चौपाल पर बैठे बुजुर्ग बीड़ी सुलगाते हुए खेती-बाड़ी की बातें करते थे, कोई अपने घर की खुशखबरी सुना रहा था तो कोई अपने दुख-दर्द साझा कर रहा होता था। गांव में किसी एक के घर खुशी होती, तो पूरा गांव खुश होता; और किसी पर मुसीबत आती, तो पूरा गांव उसके साथ खड़ा नजर आता था।

बच्चे गिल्ली-डंडा, कबड्डी और लुकाछिपी खेलते हुए धूल-मिट्टी में लथपथ हो जाते, मगर चेहरे पर थकान नहीं, बस मासूम मुस्कान होती।

उन दिनों ट्रैक्टर नहींहुआ करते थे, खेतों में बैलों से हल चलता था। किसान सुबह-सुबह खेत पर जाते, और दोपहर की तेज धूप में पेड़ की छांव में बैठकर पानी पीते और रोटी खाते। काम भले कठिन था, मगर दिल हल्का और रिश्ते मजबूत थे।

गर्मियों की छुट्टियों का तो बच्चों को साल भर इंतजार रहता था। जैसे ही स्कूल बंद होता, बच्चे अपने मामा-मामी के घर जाने की जिद पकड़ लेते। वहां पहुंचते ही नानी का लाड़, मामी के हाथ का खाना और मामा के साथ खेतों की सैर—यह सब उनके लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता था।

लेकिन धीरे-धीरे समय बदलता गया।

आज वही गांव पक्की सड़कों और बड़े-बड़े मकानों से तो भर गया, मगर चौपाल सूनी हो गई। पीपल का वही पेड़ अब भी खड़ा है, पर उसके नीचे बैठकर बात करने वाले लोग कम हो गए हैं।

जहां कभी बच्चे गिल्ली-डंडा खेलतेनज़र आते थे, वहां अब सन्नाटा है। बच्चे घरों में मोबाइल और टीवी की दुनिया में खो गए हैं।

खेती अब ट्रैक्टर और मशीनों से होने लगी है। काम आसान हो गया, मगर लोगों के बीच की दूरी बढ़ गई। अब खेतों में एक किसान अकेला काम करता दिखता है, जबकि पहले वही काम मिलजुल कर किया जाता था।

सबसे ज्यादा बदलाव रिश्तों में आगया है। अब किसी के घर दुख-सुख में पहले जैसा जमावड़ा नहीं लगता। लोग व्यस्त हो गए हैं—कोई शहर में नौकरी कर रहा है, कोई अपने कारोबार में उलझा है। किसी के पास दूसरे के लिए समय ही नहीं बचा।

दादा जी अब अक्सर चौपाल के पास बैठकर पुराने दिनों को याद करते हुए कहते है

“बेटा, हमारे जमाने में गांव सिर्फ रहने की जगह नहीं था, वह एक परिवार था।”

मैने कहा दादाजी अब समय बदल गया है।

दादा जी मुस्कुराए, लेकिन उनकी आंखों में हल्की नमी थी।

उन्होंने आसमान की ओर देखते हुए धीमे से कहा,

“समय बदला है बेटा, पर इंसानियत और अपनापन नहीं बदलना चाहिए था…”

उस दिन पहली बार मैंने अपने दादा की आंखों में छिपी कमी को महसूस किया। मैने मोबाइल एक तरफ रखदिया ।और दादा के पास बैठ गया। हम दोनों देर तक बातें करते रहे

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