छत्तीसगढ़ जनवार्ता
कोरबा। एसईसीएल की मानिकपुर ओपन कास्ट कोल परियोजना के प्रस्तावित विस्तार को लेकर प्रभावित गांवों के ग्रामीणों और भू-विस्थापितों का असंतोष एक बार फिर सामने आया है। 25 सितंबर 2026 को प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई से पहले ग्रामीणों ने मुआवजा, रोजगार, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (R&R), छूटे हुए प्रभावित परिवारों के सर्वे और मूलभूत सुविधाओं सहित 17 प्रमुख मुद्दे उठाए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि वे खदान विस्तार अथवा विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन जिन परिवारों की जमीन और आजीविका परियोजना के लिए प्रभावित हुई है, उनके पुराने लंबित मामलों का समाधान किए बिना आगे की प्रक्रिया पूरी करना उनके लिए चिंता का विषय है।
इससे पहले 21 अगस्त 2026 को प्रस्तावित जनसुनवाई को लेकर भी प्रभावित ग्रामीणों ने विरोध जताया था। विरोध और लंबित मुद्दों के बीच जनसुनवाई स्थगित हुई और अब इसकी नई तारीख 25 सितंबर निर्धारित की गई है। हाल की मीडिया रिपोर्टों में भी ग्रामीणों द्वारा मुआवजा, रोजगार, पुनर्वास तथा मूलभूत सुविधाओं से जुड़े मुद्दे उठाए जाने का उल्लेख है।
दशकों पुराने विस्थापन का अब तक समाधान नहीं होने का सवाल
ग्रामीणों के अनुसार मानिकपुर क्षेत्र में वर्ष 1963-64 के दौरान अनेक किसानों की जमीन अधिग्रहित की गई थी। प्रभावित परिवारों का कहना है कि जमीन अधिग्रहण के दशकों बाद भी कुछ मामलों में मुआवजा, रोजगार और विस्थापन से जुड़े अधिकारों का पूर्ण समाधान नहीं हो सका है।
ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि जिस जमीन के आधार पर वर्षों से कोयला उत्पादन किया जा रहा है, उसी जमीन के मूल प्रभावित परिवारों के लंबित अधिकारों का समाधान अब तक क्यों नहीं हो पाया।
उनका कहना है कि भू-विस्थापन केवल जमीन के अधिग्रहण तक सीमित नहीं होता। इसके साथ परिवार की आजीविका, खेती, मकान, सामाजिक परिवेश और बच्चों के भविष्य पर भी असर पड़ता है। ऐसे में केवल मुआवजे के बजाय रोजगार, पुनर्वास और पुनर्स्थापन को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
नियुक्ति पत्र को लेकर ग्रामीणों में संशय
ग्रामीणों के अनुसार प्रभावित आठ गांवों के लोगों द्वारा लंबे समय से रोजगार की मांग उठाई जा रही है। वर्तमान में रोजगार से जुड़ी प्रक्रिया चलने की बात सामने आ रही है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि अभी तक पात्र प्रभावित परिवारों को नियुक्ति पत्र नहीं मिले हैं।
उनका सवाल है कि यदि रोजगार की प्रक्रिया वास्तविक और अंतिम समाधान की दिशा में है तो प्रत्येक पात्र प्रभावित परिवार के मामले की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही है।
ग्रामीण चाहते हैं कि प्रभावित परिवारों के पात्र युवाओं को रोजगार देने की प्रक्रिया पारदर्शी हो तथा प्रत्येक प्रकरण की पात्रता, स्थिति और निर्णय की जानकारी सार्वजनिक की जाए।
निजी ठेका कंपनियों में रोजगार को लेकर भी सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि स्थायी रोजगार से जुड़े पुराने मामलों के समाधान से पहले निजी ठेका कंपनियों के माध्यम से रोजगार की प्रक्रिया संचालित की जा रही है। उनका कहना है कि यदि निजी कंपनियों के माध्यम से रोजगार दिया जा रहा है तो इसकी प्रक्रिया, पात्रता और चयन के मानदंड भी स्पष्ट किए जाने चाहिए।
सितंबर में निजी ठेका कंपनी से जुड़े भू-विस्थापित ड्राइवरों ने सुरक्षा राशि, लाइसेंस और दस्तावेजों को लेकर भी शिकायतें उठाई थीं। इस मामले में ग्रामीण समिति द्वारा अधिकारियों को ज्ञापन दिए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।
ग्रामीणों की मांग है कि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच हो और किसी प्रभावित व्यक्ति का आर्थिक शोषण न हो।
R&R केवल कागजों तक सीमित न रहे
भू-विस्थापितों का कहना है कि पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन यानी R&R केवल कागजी प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए। प्रभावित परिवारों को मकान, आजीविका, सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य मूलभूत सुविधाओं से जोड़ने की स्पष्ट कार्ययोजना होनी चाहिए।
साथ ही छूटे हुए मकानों, परिवारों और पात्र प्रभावितों का दोबारा सर्वे कराने की मांग भी ग्रामीणों ने उठाई है, ताकि रिकॉर्ड या सर्वे की कमी के कारण कोई वास्तविक प्रभावित परिवार अपने अधिकारों से वंचित न रह जाए।
जनसुनवाई से पहले लंबित मामलों के समाधान की मांग
ग्रामीणों का कहना है कि 25 सितंबर की प्रस्तावित जनसुनवाई से पहले लंबित मुआवजा, रोजगार और R&R प्रकरणों पर ठोस कार्रवाई होनी चाहिए।
उनका सवाल है कि जब पुराने मामले लंबित हैं तो नई जनसुनवाई को केवल औपचारिक प्रक्रिया क्यों बनने दिया जाए। ग्रामीण चाहते हैं कि जनसुनवाई से पहले SECL प्रबंधन, जिला प्रशासन और प्रभावित परिवारों के बीच औपचारिक बैठक आयोजित हो।
बैठक में प्रत्येक प्रभावित परिवार के मामले की सूची तैयार की जाए, कौन-सा प्रकरण लंबित है, किस स्तर पर लंबित है और उसके निराकरण की समयसीमा क्या होगी—यह स्पष्ट किया जाए।
अगस्त में उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन द्वारा भी SECL अधिकारियों से प्रभावित लोगों के मुआवजा, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन से संबंधित कार्यों के निराकरण के बाद जनसुनवाई कराने के निर्देश दिए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।
सड़क, स्कूल, आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग
ग्रामीणों ने क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं से जुड़े सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि भिलाईखुर्द, दर्रीपारा और कोरबा-चांपा मुख्य मार्ग स्थित बजरंग चौक के आसपास स्कूल भवन, सामुदायिक भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, स्वास्थ्य केंद्र, मुक्तिधाम तथा निवासरत मोहल्लेवासियों के लिए उचित सड़क व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।
ग्रामीणों के अनुसार खदान विस्तार के साथ प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी नागरिक सुविधाओं का विस्तार भी आवश्यक है।
राखड़ के पहाड़ और पर्यावरणीय प्रभाव का मुद्दा
ग्रामीणों ने मानिकपुर की बंद खदान के समतलीकरण और राखड़ के निस्तारण को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली राखड़ को बंद खदान क्षेत्र में भरकर समतलीकरण किया जाना था, लेकिन वहां राखड़ का बड़ा ढेर बन गया है। उनका कहना है कि तेज हवा और आंधी के दौरान राखड़ के गुबार से आसपास का क्षेत्र प्रभावित होता है।
ग्रामीणों का दावा है कि इससे लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, किसानों की फसलों को नुकसान हो रहा है और कोरबा-चांपा मुख्य मार्ग पर भी राखड़ के फैलने का खतरा बना रहता है। उन्होंने यह भी आशंका जताई है कि राखड़ बहकर हसदेव नदी के पानी को प्रदूषित कर सकती है।
इन पर्यावरणीय दावों की स्वतंत्र जांच और संबंधित विभागों द्वारा वैज्ञानिक एवं तथ्यात्मक परीक्षण कराए जाने की मांग भी ग्रामीणों की ओर से उठाई जा रही है।
विकास के विरोध में नहीं, अधिकारों के समाधान की मांग
भू-विस्थापितों का कहना है कि उनकी मांग किसी व्यक्ति या अधिकारी के खिलाफ नहीं है। उनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परियोजना विस्तार से पहले पुराने प्रभावित परिवारों के अधिकारों का समाधान हो।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें हैं—
लंबित मुआवजा प्रकरणों का निराकरण।
पात्र प्रभावित परिवारों के युवाओं को रोजगार।
रोजगार संबंधी प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयसीमा।
लंबित R&R प्रकरणों का वास्तविक समाधान।
छूटे हुए प्रभावित परिवारों और मकानों का पुनः सर्वे।
प्रभावित परिवारों के प्रत्येक मामले की सूची और स्थिति सार्वजनिक करना।
SECL, जिला प्रशासन और ग्रामीणों के बीच औपचारिक बैठक।
प्रत्येक प्रकरण के निराकरण की समयसीमा घोषित करना।
निजी ठेका कंपनियों में रोजगार से जुड़ी शिकायतों की जांच।
प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी और सामुदायिक सुविधाओं की व्यवस्था।
राखड़ के निस्तारण और पर्यावरणीय प्रभाव की जांच।
25 सितंबर की जनसुनवाई पर टिकी नजर
मानिकपुर खदान विस्तार की परियोजना में उत्पादन क्षमता को 5.25 एमटीपीए से बढ़ाकर 7.0 एमटीपीए किए जाने का प्रस्ताव है। इसी विस्तार को लेकर पर्यावरणीय जनसुनवाई की प्रक्रिया चल रही है।
21 अगस्त की प्रस्तावित जनसुनवाई के स्थगित होने के बाद अब 25 सितंबर की तारीख सामने आई है। ऐसे में आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि जनसुनवाई से पहले प्रभावित परिवारों के लंबित मामलों पर क्या ठोस कार्रवाई होती है और ग्रामीणों की आपत्तियों का किस स्तर पर समाधान किया जाता है।
अंतिम सवाल
दशकों पहले जिन परिवारों की जमीन लेकर विकास की नींव रखी गई, आज उन्हीं परिवारों को अपने अधिकारों के लिए धरने पर बैठना पड़ रहा है। सवाल खदान के विस्तार का ही नहीं, बल्कि यह भी है कि विस्तार से पहले पुराने प्रभावित परिवारों के लंबित अधिकारों का समाधान किस तरह और कितनी समयसीमा में किया जाएगा।
ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं। वे चाहते हैं कि विकास की प्रक्रिया प्रभावित परिवारों के अधिकारों और न्यायपूर्ण पुनर्वास के साथ आगे बढ़े।










