कम उम्र के बच्चों में बढ़ती नशे की लत: भविष्य पर खतरा, कार्रवाई अभी भी अधूरी

छत्तीसगढ़ जनवार्ता 

कोरबा।  18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों और किशोरों में नशे की लत तेजी से बढ़ती नजर आ रही है। सिगरेट, तंबाकू, गुटखा, नशीले पदार्थ और कुछ मामलों में नशे की दवाओं की आसान उपलब्धता ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। चिंताजनक बात यह है कि यह समस्या अब केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसके कारण चोरी, झगड़े और अन्य छोटे अपराधों की घटनाओं में भी वृद्धि देखने को मिल रही है, जिससे समाज का सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि कई इलाकों में नाबालिग बच्चे खुलेआम तंबाकू और सिगरेट खरीदते देखे जा सकते हैं। कुछ मामलों में नशे की गोलियां यहां तक की शराब  भी किशोरों तक आसानी से पहुंच रहे हैं। इसके कारण स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ रही है और कई किशोर गलत संगत में पड़कर अपराध की ओर भी बढ़ रहे हैं।

दूसरी ओर शासन का कहना है कि समस्या से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके समाधान के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। प्रशासन का तर्क है कि शराब की बिक्री पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है, इसलिए जिले में नशा मुक्ति केंद्र संचालित किए जा रहे हैं, जहां नशे की लत से जूझ रहे लोगों को उपचार और परामर्श की सुविधा दी जाती है। हालांकि जमीनी हकीकत पर नजर डालें तो इन केंद्रों का प्रभाव सीमित ही दिखाई देता है और बहुत कम लोग इनसे लाभ लेते नजर आते हैं।

शासन प्रशासन का कहना है कि नाबालिगों में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति को गंभीरता से लिया जा रहा है। समय-समय पर तंबाकू और नशीले पदार्थ बेचने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी की जाती है। वहीं स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि नशा एक बीमारी है, जिसका इलाज और परामर्श दोनों जरूरी हैं। विभाग की ओर से स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं ताकि किशोरों को नशे से दूर रखा जा सके।

फिलहाल स्थिति यह है कि समस्या को स्वीकार तो किया गया है, लेकिन कार्रवाई अधिकतर छिटपुट और दंडात्मक नजर आती है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कार्रवाई से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए रोकथाम, उपचार और पुनर्वास—तीनों स्तरों पर एक साथ काम करना जरूरी है।

स्कूल ड्रॉपआउट, झगड़े और चोरी जैसी घटनाओं में नाबालिगों की संलिप्तता बढ़ना भी इसी समस्या की ओर इशारा करता है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह सामाजिक संकट का रूप ले सकता है।

दूसरे राज्यों से सीख

पंजाब के अमृतसर और लुधियाना जैसे शहरों में “नशा मुक्त युवा अभियान” चलाया गया, जिसमें स्कूलों में नियमित काउंसलिंग, सामुदायिक नशा मुक्ति केंद्र, पुलिस-स्वास्थ्य-शिक्षा विभाग की संयुक्त कार्रवाई और माता-पिता के लिए परामर्श सत्र आयोजित किए गए। इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम यह रहा कि किशोरों में नशे की शुरुआत की उम्र बढ़ी और अपराध की घटनाओं में कमी आई।

आगे की राह 

विशेषज्ञों के अनुसार  इस समस्या से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति की जरूरत है। नाबालिगों द्वारा नशा करने और नशा बेचने वालों पर सख्त निगरानी, स्कूलों में काउंसलिंग और जीवन कौशल शिक्षा, मोहल्ला और पंचायत स्तर पर जागरूकता अभियान तथा नशा मुक्ति और परामर्श केंद्रों की पहुंच बढ़ाना जरूरी है।

समाधान,

यदि शासन, समाज और परिवार मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाएं तो आने वाली पीढ़ी को नशे के जाल से बचाया जा सकता है।

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