कोरबा, छत्तीसगढ़
तीन बार तटबंध टूटने से लाखों टन राखड़ नदी में बहा, ग्रामीणों में दहशत और प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
कोरबा जिले में ऊर्जा उत्पादन करने वाले संयंत्रों से निकलने वाला राखड़ अब पर्यावरण और ग्रामीण जीवन के लिए बड़ा संकट बनता जा रहा है। सी एस इ बी के झाबु स्थित राखड़ डैम का तटबंध बीते एक महीने में तीन बार ध्वस्त हो चुका है, जिससे लाखों टन राखड़ युक्त पानी सीधे हसदेव नदी में मिल गया। इसके बाद नदी का पानी पूरी तरह सफेद नजर आने लगा और आसपास के गांवों में दहशत का माहौल बन गया।
जानकारी के अनुसार 2 फरवरी को पहली बार राखड़ डैम का तटबंध टूटा था। उस समय प्रबंधन द्वारा जल्दबाजी में अस्थायी मरम्मत कर मामले को शांत करने की कोशिश की गई। इसके बाद 20 फरवरी को फिर वही तटबंध दोबारा टूट गया। अभी लोग पहली घटना को भूल भी नहीं पाए थे कि 2 मार्च, यानी होली के ठीक एक दिन पहले, तीसरी बार डैम का तटबंध ध्वस्त हो गया। इस तरह महज 30 दिनों में तीन बार तटबंध टूटना प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यदि तटबंध में पहले से ही दरार या रिसाव हो रहा था, तो क्या रखरखाव और मरम्मत करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी? या फिर जानबूझकर लापरवाही बरती गई? ग्रामीणों के बीच चर्चा यह भी है कि कहीं यह कमीशन और कागजी मरम्मत का खेल तो नहीं, जहां हर बार अस्थायी तरीके से काम दिखाकर लाखों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं।
डैम टूटने के दौरान हालात इतने खराब थे कि मौके पर पहुंची जेसीबी मशीन भी धंस गई और पाइपलाइन बहकर निकल गई। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि तटबंध की संरचना बेहद कमजोर हो चुकी थी।
हसदेव नदी में राखड़ युक्त पानी मिलने से नदी का पानी तेजी से प्रदूषित हो रहा है। इसका सीधा असर आसपास के गांवों और खेतों पर पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि राखड़ मिला पानी खेतों तक पहुंच रहा है, जिससे फसलें प्रभावित हो रही हैं और भूमि की उर्वरता खत्म होने का खतरा बढ़ रहा है। कई ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में गांवों का अस्तित्व भी संकट में पड़ सकता है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि राखड़ डैम के रखरखाव और मरम्मत के लिए हर वर्ष लाखों रुपये की निविदाएं जारी की जाती हैं, लेकिन उसके बावजूद बार-बार तटबंध टूटना इस पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है।
जब इस पूरे मामले में संयंत्र के सिविल विभाग से जानकारी लेने की कोशिश की गई तो अधीक्षण यंत्री नेताम ने स्पष्ट जवाब देने के बजाय गोलमोल बातें करते हुए अन्य अधिकारियों से जानकारी लेने की बात कहीऔर अपने आप को विभाग में नया बताकर जानकारी न होने की बात कही । इससे भी संदेह और गहरा हो गया कि कहीं प्रबंधन इस पूरे मामले को टालने की कोशिश तो नहीं कर रहा।
बताया जा रहा है कि राखड़ के निस्तारण के लिए प्रबंधन द्वारा निशुल्क परिवहन की सुविधा दी जा रही है, जिसके कारण प्रतिदिन सैकड़ों गाड़ियां तटबंध के ऊपर से गुजरती हैं। तटबंध के किनारे जेसीबी से राखड़ डालने के कारण पानी का बहाव भी तटबंध की ओर हो जाता है, जो टूटने का एक कारण बन सकता है।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में एक राहत की बात यह रही कि तटबंध जंगल की ओर टूटा। यदि यह तटबंध गांव की दिशा में टूटता तो स्थिति बेहद भयावह हो सकती थी और पूरा गांव जलमग्न होने का खतरा पैदा हो जाता।
इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल और सिंचाई विभाग की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। फरवरी माह के दौरान लाखों टन राखड़ हसदेव नदी में बह चुका है, लेकिन अब तक न तो पर्यावरण विभाग की ओर से कोई ठोस कार्रवाई सामने आई और न ही सिंचाई विभाग ने नदी के प्रदूषण को लेकर कोई सख्त कदम उठाया।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या राखड़ डैम की मरम्मत सिर्फ कागजों में हो रही है?
क्या लाखों रुपये की निविदाएं सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई हैं?
क्या पर्यावरण और किसानों की कीमत पर उद्योगों को खुली छूट दी जा रही है?
और सबसे बड़ा सवाल — क्या हसदेव नदी को राखड़ का नाला बनने दिया जाएगा?
ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और स्थायी समाधान नहीं किया गया तो वे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।












