भाजपा के पुराने कर्मठ और समर्पित कार्यकर्ताओ के लिए परेशानी, नही हो रही पूछ परख भाजपा को कही हो ना जाए इससे हानि

कोरबा छत्तीसगढ

इन दिनों देश में लोकतंत्र का महापर्व लोकसभा चुनाव चल रहा है जिसमे देश के सभी राजनैतिक दल अपनी पूरी ताक़त के साथ अपने दल के प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करने में लगा रहे है वही दूसरी और देखे तो कुछ नेता अपना स्वार्थ सिद्ध करने दल बदलने में लगे है और सत्तासीन दल में प्रवेश कर रहे है

एक तरफ कांग्रेस और स्थानीय पार्टी के कार्यकर्त्ता  धड़ाधड़ भाजपा में प्रवेश कर रहे  है, तो वही भाजपा के प्रत्याशी और पदाधिकारी उनका सम्मान के साथ उन्हें मंच के साथ जिम्मेदारी सौंप रहे है ताकि उन्हें प्रचंड मतों से विजय मिले, पर वे यह भूल रहे हैं की ये वही नेता हैं जिनके सत्ता में रहने पर उनकी गतिविधियों के कारण जनता ने उनसे सत्ता छीन ली थी ,तो वे अब जनता का विश्वास कैसे जीत पाएंगे, ऐसे लोगो को भाजपा में प्रवेश और सम्मान देने से भाजपा ओवरलोडेड हो चुकी है इसका कही न कही भाजपा के पुराने कर्मठ और समर्पित कार्यकर्ताओ के लिए परेशानी का सबब बन गया है

छत्तीसगढ़ में 15 साल भाजपा की सत्ता होने के बाद भी कार्यकर्ताओ ने उपेक्षा का सामना किया है जिसका परिणाम २०१८ में भाजपा ने देखा था

भाजपा अपने पुराने कार्यकर्ताओ के कार्यशैली और जनता का उनपर विश्वास के दम पर आज जिस सत्ता पर बैठी है और जनता उनपर विश्वास कर रही है ऐसे कार्यकर्ताओ की उपेक्षा कर रही है वही 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पुनः प्रचंड बहुमत से सरकार बना ली जिसके बाद भाजपा कार्यकर्ताओ को उम्मीद थी कि अब उनकी सुनी जाएगी मगर जिस तरह से भाजपा में कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल शामिल हो रहे है उससे भाजपा ओवरलोडेड हो चुकी है भाजपा नेता और प्रत्याशी  चाटुकारों और अन्य दलो से आये  लोगो को तब्बजो देने में लगे है क्योकि उनके द्वारा बड़े बड़े आयोजन और बेनर पोस्टर लगाकर भाजपा नेताओ के नजरो  को ढक दिया जाता है जिससे उन्हें अपने इमानदार और कर्मठ कार्यकर्त्ता नहीं दीखते

इस लोकसभा चुनाव में पार्टी कार्यकर्त्ता जो भीषण गर्मी में भी घर घर जाकर चुनाव प्रचार करते थे वे अब चुप्पी साध कर घर मैं बैठे दिख रहे है भाजपा का चुनाव प्रचार केवल बेनर पोस्टर और सोशल मिडिया में नजर आता है बूथ स्तर पर अपने को मजबूत कहने वाले अब तक नहीं पहुचे बुथो पर

जो पुराने कर्मठ कार्यकर्ता है उनको तवज्जो दी जाए कांग्रेस और अन्य दल के लोगो की पूछ परख को देखकर भाजपा कार्यकर्ता असमंजस की स्थिति में है कही इस तरह से आ रही भीड़ से उनके राजनीतिक करियर पर क्या असर डालेगा . हालांकि भाजपा के पुराने कार्यकर्ता लोग दबी दबान में अपनी पीड़ा तो बता रहे है यह पीड़ा अगर बढ़ी तो यह भाजपा के लिए मुसीबत का सबब जरूर बनेगी .

कार्यकर्ताओ के कुछ प्रश्न

आखिर क्यों  चुनावी समर में कुछ नेता अपने दल जिनसे उन्हें जनता के बीच पहचान मिली उसे छोड़कर सत्तासीन दल में शामिल हो रहे हैं ?

यदि उनसे दल बदलने का कारण पूछे तो एक ही जवाब मिलेगा जनता के हित में कार्य करने के लिए हम सत्तासिन दल की कार्यशैली से प्रभावित होकर जा रहे हैं क्यों ?

यदि वे अपने ही दल में रहकर जनता  के हित में काम करते  तो क्या जनता उन्हें सत्ता से हटाती  क्या ?

अब वे दुसरे दल में जाकर जनता का क्या हित करेंगे ?

कही वे इस डर से दल तो नहीं बदल रहे की उनके कार्यकाल में उनके द्वारा किये भर्ष्टाचार की पोल ना खुल जाये या फिर किसी स्वार्थ के लिए जो सत्ता में रहकर किया जा सके ?

कोरबा लोकसभा में भाजपा और कांग्रेस में कांटे की टक्कर

कोरबा लोक सभा में  बाहरी और अंतर्कलह से झुझ रही भाजपा और पांच साल अपने लोकसभा क्षेत्र से नदारत रही कांग्रेस प्रत्यासी के बीच कांटे का मुकाबला है

देखना यह है कि भाजपा कैसे बाहरी प्रत्यासी के आरोप अंतर्कलह से निपटती है और कांग्रेस कैसे पांच सालों के नदारत रहने के बाद अपने पक्ष में वोट मांगती है हालांकि इस चुनाव में नेता प्रतिपक्ष की भी साख दांव पर लगी है और उनकी राजनिति भी हासिये पर टिकी है चूंकि इस लोकसभा में चरण दास महंत को कही से टिकट नही मिली है चरण दास महंत अपनी पत्नी के लिए पूरी तन्मयता और ताकत से लगे हुए है यह चुनाव उनके राजनीतिक केरियर के लिए भी बड़ा प्रश्न चिन्ह बना हुआ है . अब परिणाम ही बतायेगे की आखिर कौन होगा लोकसभा का सरताज और किसके सर पर होगी ताजपोशी .

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